सरकार और कॉरपोरेट को पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की कलम से दिक्कत है! इसलिए तीन साल से जेल में हैं?
🔘 ईप्सा शताक्षी
17 जुलाई 2025 को एक जनपक्षीय, निडर, साहसी पत्रकार रूपेश कुमार सिंह के जेल जीवन के तीन साल पूरे हो गए। 17 जुलाई 2022 को रूपेश कुमार सिंह को झारखंड के सरायकेला-खरसांवा के एक 9 महीने पूराने मामले में गिरफ्तार कर लिया गया था, जिसके एफआईआर में रूपेश का नाम नहीं है। गिरफ्तारी तो एक मामले में हुई लेकिन उसके बाद लगातार 3 और मामले उन पर लगा दिए गए।
रूपेश कुमार सिंह पर वर्तमान में कुल 5 मामले हैं, जिनमें 3 मामले में उनका नाम एफआईआर में नहीं है। और इन 5 मामलों में 2 बिहार के हैं तथा 3 झारखंड के।
इन 5 मामलों में एक 4 जून 2019 का है, जब बुरी नियत से इनका प्रशासनिक अपहरण कर लिया गया था और रूपेश के गायब होने पर संबंधित थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने और सोशल मीडिया पर मामला हाईलाइट होने पर आनन-फानन में इनके साथ दो अन्य लोग जिनमें एक रूपेश के रिश्तेदार तथा दूसरा उनके ड्राइवर के नाम 6 जून को एफआईआर दर्ज कर एक केस तैयार कर लिया गया था, पर 180 दिन की तय सीमा तक चार्जशीट दाखिल न हो पाने का लाभ मिलते हुए इन्हें ' डिफॉल्ट बेल' पर रिहा किया गया था।
उसके बाद दोबारा 17 जुलाई 2022 को इन्हें झारखंड के रामगढ़ स्थित घर से गिरफ्तार कर लिया गया और धीरे- धीरे 3 मामले और लगा दिए गए। कारण बताया गया माओवाद कनेक्शन, जिनमें 2 मामलों में बेल मिल गई है और 1 मामले को 27 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने रिजेक्ट कर दिया और बचे एक मामले में जिसे एनआईए ने टेकओवर किया है, इसमें बेल अप्लाई नहीं किया गया है।
रूपेश एक ऐसे इंसान हैं जो अपने घर परिवार, यहां तक कि अपने छोटे से बच्चे की परवाह किए बगैर सामाजिक मुद्दों पर खुलकर लिखते रहे, बोलते रहे, सच के साथ खड़े रहे। इसके लिए संघर्ष कर रहे लोगों के साथ खड़े रहे हैं। यहाँ तक कि जेल में भी अनियमितता और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, यही कारण है कि वह जेल प्रशासन के झूठे, बेबुनियाद आरोप के साथ जेल ट्रांसफर झेल रहे हैं।
रूपेश को झारखंड- बिहार की कुल 4 जेलों में ट्रांसफर किया जा चुका है। जिनमें झारखंड की दो जेल और बिहार की दो जेल शामिल हैं। रूपेश वर्तमान में भागलपुर के शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारागार में पिछले 22/23 जनवरी 2024 से बंद हैं। इनके हर जेल ट्रांसफर का कारण जेल के अंदर हो रही अनियमितता पर सवाल उठाना रहा है। पर हर बार इन्हें प्रशासन द्वारा मनगढ़ंत कारण बताकर जेल ट्रांसफर किया गया है।
रूपेश का जेल जीवन और पढ़ाई
भागलपुर के शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारागार में बंद रूपेश कुमार सिंह ने इन 3 साल के जेल जीवन में 2 कोर्स की पढ़ाई इग्नू से करने की कोशिश की। जिसमें इतिहास से मास्टर्स पूरा कर लिया है। और जर्नलिज्म इन मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई भी पूरी करने की कोशिश जारी है। इस कोर्स के प्रैक्टिकल असाइनमेंट को पूरा करने के लिए इन्हें कैमरा या मोबाइल, कम्प्यूटर जैसे उपकरणों की जरूरत है, जिसके लिए जेल प्रशासन से अभी तक अनुमति नहीं मिली है। वहीं इससे संबंधित बाकि सारी परीक्षाएँ रूपेश पास कर चुके हैं।
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जेल में बंद रूपेश कुमार सिंह को यह चिट्ठी उनके बेटे ने लिखी है |
• दुर्योधन अभी मरा नहीं है - एच.एन. राम।
• बिहारी परम्पराएं और वैज्ञानिक शोध।
वैसे रूपेश ने 2012 में भागलपुर के तिलका मांझी विश्वविद्यालय से 'गांधी के विचार' से स्नातकोत्तर पूरा किया है। पर जेल से इतिहास में स्नातकोत्तर पूरा कर लेने पर अब डबल एमए हो चुके हैं।
रूपेश की गिरफ्तारी का कारण
स्पष्ट है कि रूपेश की गिरफ्तारी उनकी लेखनी, जो भ्रष्ट सिस्टम का पोल खोलती है, हम तक सही खबरें पहुंचाती है, के कारण ही की गई है। भले ही इसके लिए माओवाद कनेक्शन का लेबल चिपकाया जा रहा है, रुपेश की अधिकांश लेखनी झारखंड की आदिवासी जनता के मुद्दों से जुड़ी है। जाहिर है, उनपर माओवाद का लेबल चिपकाना इनके लिए सबसे आसान है।
यह एक पत्रकार की गिरफ्तारी नहीं है, प्रेस की स्वतंत्रता को कैद करने की साज़िश है, ताकि झारखंड की आदिवासी, मूलवासी और उत्पीड़ित जनता के सवाल क्षेत्र भर में ही दबकर रह जाए और कार्पोरेट जगत को पूरी स्वतंत्रता से जनता की जमीन की लूट के लिए आमंत्रित किया जा सके।
आज के समय में पूरे देश में हम देख रहे हैं कि जो लोग सत्ता की गलत नीतियों का किसी भी माध्यम से विरोध कर रहे हैं या गरीब जनता के साथ खड़े हैं, उन्हें झूठे केस में फंसाकर जेलों में बंद किया जा रहा है। जनता से जुड़े मुद्दों को, आंदोलनों को, लेखों को, भाषणों को अपराध की श्रेणी में डाला जा रहा है, यूएपीए के घेरे में रखा जा रहा है, लेखक, पत्रकार, एक्टिविस्ट सभी इस घेरे में शामिल किये जा रहे हैं। पर क्या सच में यह भ्रष्ट व्यवस्था हमारे देश को उन्नति की राह पर ले जाएगी?
हम यह जरूर कहना चाहेंगे कि 90 प्रतिशत जनता की जिंदगी, उनके हक अधिकार के लिए बोलने वाले लोगों की जिंदगी कोई मजाक नहीं है। सत्ता और प्रशासन सारे सिस्टमों को ताक पर रखकर अगर जिंदगियों के साथ यह मजाक कर रहे हैं, तो हम इस मजाक के खिलाफ़ लड़ने को तैयार हैं। न ही एक सुखद समाज की कल्पना अपराध है और न ही उसके लिए आलोचनात्मक रचनाएं, स्वतंत्र लेखन कोई अपराध है।
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पत्रकार रूपेश कुमार सिंह, पत्नी इप्सा सताक्षी के साथ |
रूपेश की रिहाई की आवाज
मैं ईप्सा शताक्षी, पत्नी रूपेश कुमार सिंह, उन सभी साथियों के प्रति आभारी हूं, जिन्होंने रुपेश की रिहाई के लिए किसी भी मंच से आवाज उठाई है। गिरफ्तारी के बाद क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यक्तिगत रूप से या संस्था द्वारा रूपेश की रिहाई के लिए आवाज उठाई जाती रही है। झारखंड की विधान सभा से लेकर यूनाइटेड नेशन तक ने रूपेश की रिहाई के लिए आवाज उठाई है। इस कड़ी में 2025 में रूपेश के 11अप्रैल को 1000 दिन पूरे होने पर इनकी रिहाई को लेकर देश के कई पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्त्ता, वकील, छात्र व अन्य प्रगतिशील व न्यायप्रिय लोगों ने देश के मुख्य न्यायाधीश के नाम एक हस्ताक्षरित पत्र जारी किया है। जिसमें लोगों ने एक पत्रकार के तौर पर रूपेश के काम को रखते हुए इनकी रिहाई की मांग को लेकर एकजुटता दिखाई है।
मुख्य न्यायाधीश को लिखे खुले पत्र में कहा गया है कि रूपेश के काम ने मानवाधिकारों के उल्लंघन के साथ-साथ कॉर्पोरेट द्वारा जीवन और पर्यावरण के विनाश को उजागर किया है, "लोगों से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर सच्चाई को उजागर करने की उनकी प्रतिबद्धता के कारण ही उन्हें राज्य द्वारा निशाना बनाया गया है।"
वैसे तो हम सभी न्यायपसंद, अमनपसंद लोग एक-दूसरे के साथ खड़े हैं। पर यहाँ हमें रूपेश सरीखे लोगो के साथ और भी मजबूती से खड़े होने की जरूरत है,और हम रहेंगे। क्योंकि हम देख रहे हैं कि मानवाधिकार की लड़ाई, न्याय की लड़ाई लड़ने वाले लोगों के लिए समय और भी कठिन होता जा रहा है, ऐसे में हम सब एक दूसरे की ताकत हैं, एक दूसरे का भरोसा हैं। हम यह हर कदम बनाए रखेंगे। (साभार-फेसबुक)
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