Wednesday, August 27, 2025

रॉयटर्स की फोटोजर्नलिस्ट वलेरी ज़िंक का इस्तीफा दुनिया की आंखें खोलने वाला है, इसे हर किसी को पढ़ना चाहिए


🔎 सत्यवीर सिंह

मासूम बच्चों के खून की प्यासी, बर्बर, इसरायली फौज़ ने, 25 अगस्त को, गाज़ा के एक मात्र बचे, ‘नासिर अस्पताल’ पर ड्रोन से हमला कर दिया. पहले हमले में, जब दो-चार लोग ही मरे और इस ख़ूनी फौज़ की खून की प्यास नहीं बुझी, तो दोबारा हमला किया गया. उन्हीं के पहले हमलों में जिंदा बचे 20 मरीज़ मारे गए, जिनमें 6 पत्रकार भी शामिल हैं. मरने वालों में, एक पत्रकार, इंग्लैंड की न्यूज़ एजेंसी, ‘रॉयटर्स’ का भी था. गाजा में चल रहे ख़ूनी खेल का एक और बहुत दर्दनाक पहलू यह भी है कि जिन न्यूज़ कंपनियों के पत्रकार गाजा में शहीद होते हैं, वे कंपनियां भी, उनकी मौत पर बस रस्मी रंज ही ज़ाहिर करती हैं, क्योंकि इन ख़बरी कंपनियों के हाथ-मुंह भी गाजा के मासूम बच्चों के लहू में रंगे हैं. इन दुर्दांत मुनाफ़ाखोर कंपनियों ने इजराइल के जघन्य अपराध छुपाए हैं, गाज़ा की असली तस्वीर उजागर नहीं होने दी. 


इसी रॉयटर्स कंपनी की एक बहादुर और संवेदनशील, कनाडा निवासी पत्रकार, वलेरी जिंक, रॉयटर्स के इस घिनौने चरित्र को बर्दाश्त नहीं कर पाई. उन्होंने अपनी 8 वर्ष की नौकरी के बाद कंपनी से इस्तीफा दे दिया. इतना ही नहीं, कंपनी के प्रति अपनी घृणा को रेखांकित करने के लिए, उन्होंने, अपने इस्तीफे के साथ, कंपनी के अपने पत्रकार बैज के दो टुकड़े कर, नत्थी का भेज दिए. ज़िम्मेदार, संवेदनशील और दिलेर पत्रकार, वलेरी ज़िंक का इस्तीफा दुनिया की आंखें खोलने वाला है, जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए. इस्तीफे का हिंदी अनुवाद यहां प्रस्तुत है:


“पिछले 8 साल से, मैं, रायटर न्यूज़ एजेंसी में स्ट्रिंगर (अतिरिक्त संवाददाता) के पद पर काम कर रही हूं. घटनास्थलों की मेरी रिपोर्ट, मेरी फोटो के साथ, उत्तरी अमेरिका, एशिया, यूरोप की अनेक न्यूज़ संस्थाओं जैसे अल ज़ज़ीरा, न्यूयॉर्क टाइम्स में भी छप चुकी हैं. गाज़ा में, इजराइल द्वारा संस्थागत रूप से क़त्ल हुए 245 पत्रकारों की हत्याओं को उचित ठहराने और उस क़त्लेआम में, इजराइल की मदद करने में, रॉयटर्स की संलिप्तता के बाद, इस संस्था से संबंध बनाए रखना, मेरे लिए मुमकिन नहीं रहा है. फिलिस्तीन में अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे अपने साथियों के प्रति मेरी यह ज़िम्मेदारी तो बनती ही है. मैं तो समझती हूं, इससे बहुत ज्यादा बनती है. 


जब, 10 अगस्त को, गाज़ा में, अल ज़ज़ीरा के पत्रकार, अनस अल शरीफ़ मारे गए, तब रायटर ने, इजराइल का वह बक़वास बयान छापा, कि वह हमास का कारिंदा था. यह, उन करोड़ों झूठे बयानों में से एक था, जिसे रॉयटर्स जैसी न्यूज़ कंपनियां अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर समाज को परोसती रही हैं, और उन्हें गौरवपूर्ण बताती रही हैं. इजराइल के दुष्प्रचार पर, समाज का भरोसा क़ायम करने और उसे बढ़ाने में, रॉयटर्स की उत्सुकता के बाद भी, इजराइल ने, इनके उसके अपने पत्रकारों को भी, क़त्ल करने से नहीं बख्शा. रॉयटर्स के कैमरामैन, हसम अल मसूरी के अलावा, 5 पत्रकार भी, उन 20 बेक़सूर लोगों में शामिल हैं, जो नासर अस्पताल पर हुए हमले में मारे गए. यह क़त्ल करने का वह तरीका है, जिसे ‘दोहरी घात’ बोला जाता है, जिसमें, इजराइल, पहले, किसी नागरिक ठिकाने, जैसे स्कूल या अस्पताल पर हमला करता है, फिर, बचाव टीम, डॉक्टरों, पत्रकारों के उस ठिकाने पर पहुंच जाने का इंतज़ार करता है, और फिर से हमला करता है.


ऐसी परिस्थितियां पैदा करने में, पश्चिमी मीडिया, आपराधिक रूप से संलिप्त है. जैसा कि ‘ड्रॉप साईट न्यूज़’ के पत्रकार जेर्मी शाहिल ने कहा है: “युद्ध अपराधों को उचित ठहराना, पीड़ितों को ही गुनहगार बताना, अपने साथियों को मरने के लिए छोड़ देना, और नैतिक, सच्ची रिपोर्टिंग से पल्ला झाड़ लेना; ‘न्यूयॉर्क टाइम्स से वाशिंगटन पोस्ट तक, एसोसिएटेड प्रेस से रायटर तक, हर बड़ी न्यूज़ कंपनी ने, ऐसा कर, इजराइली गिरोह की कड़ी के रूप में ही काम किया है.


नरसंहार के अमानवीय अपराध को उचित ठहराने के इजराइल के झूठ को, बिने परखे सही मान कर दोहराते चले जाना, पत्रकारिता की आधारभूत ज़िम्मेदारी को सचेत रूप से त्याग देना, पश्चिमी मीडिया की इसी भूमिका से, इस छोटी सी पट्टी में, दुनिया में किसी भी जगह से, चाहे पहला-दूसरा विश्वयुद्ध हो, कोरिया, विएतनाम, अफ़गानिस्तान, युगोस्लाविया, युक्रेन हो, सब से कहीं ज्यादा पत्रकार मारे गए हैं, दूसरी ओर, इस मीडिया ने, पूरी की पूरी आबादी को भूखों मार डालने, चिथड़ा-चिथड़ा हो चुके बच्चों और जिंदा जलते इंसानों को अनदेखा किया है. 


जब दूसरे देश पर क़ब्ज़ा कर रही इसरायली फौज़ ने, उसे इस्लामी ज़ेहादी और हमास का कारिंदा बताकर, अपनी ‘हिट लिस्ट’ में शामिल किया, तब, अनस अल शरीफ़, जिसका काम उन्हें पुलित्ज़र पुरस्कार दिला चुका है, यह हक़ीक़त भी इन लोगों को उसके बचाव में लाने में नाकाम रही. 


इसराली फौज़ के प्रवक्ता ने, जब गाज़ा की भुखमरी रेखांकित करने वाला, उनका एक विडियो, अपने पोर्टल पर डाला और यह साबित कर दिया कि उन्होंने उसे क़त्ल करने का इरादा कर लिया है, तब अनस ने, अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की मदद मांगी थी, तब भी रॉयटर्स उनके बचाव में आने को राज़ी नहीं हुई. उसके हफ़्तों बाद, जब उसका क़त्ल हो गया, तब भी इन लोगों ने उसकी सही रिपोर्टिंग नहीं की. 


पिछले 8 वर्षों में, मैंने रॉयटर्स के लिए जो काम किया है, मैं उसका महत्व जानती हूं, लेकिन इस वक़्त, रॉयटर्स का यह ‘प्रेस बैज’ पहनना, मेरे लिए गहरी शर्म और पीड़ा का सबब बन गया है. दुनिया के बहादुरों में भी सबसे ज्यादा बहादुर, गाज़ा में शहीद हुए पत्रकारों की बहादुरी का कैसे सम्मान किया जाए, मुझे समझ नहीं आ रहा—लेकिन इस वक़्त मेरे दिमाग में इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं कि उन्हें सम्मान देने के सफ़र में मैं आगे बढ़ती जाऊँगी.”- वलेरी ज़िंक

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