Thursday, August 28, 2025

केवल प्रधान संपादकों को पीटने से कुछ नहीं होगा, वे तो बेचारे 'नौकर' हैं एडिटर नहीं !

मीडिया के वर्तमान हालात पर हरि श्याम जोशी का एक कार्टून 

🔖 सुभाष अखिल 

अभी एक मित्र की सोशल मीडिया पोस्ट पढ़ रहा था, जहां वे 'प्रधान संपादकों को बांधकर पीटने' की बात कर रहे थे। तब बहुत दुख हुआ कि शायद वे 'मीडिया के भीतर की विषमताओं को सही-सही नहीं जानते। इसीलिए मुझे लगा कि उनका वक्तव्य एक पक्षीय है---आज बड़े से बड़े मीडिया संस्थान का संपादक भी, यदि स्वयं मालिक नहीं है, तो वह नौकर ही है ! बल्कि कुछ मामलों में तो मालिक भी (कथित रूप से) अपने-अपने आकाओं के पास--- गिरवी रखे हुए से दिखाई देते हैं। हालांकि अपवाद भी संभव हो सकते हैं, किन्तु 'सीधी रीढ़ वाले संपादक, आज लुप्तप्राय' ही नज़र आते हैं। 


मेरा विनम्र प्रति-उत्तर था : "हालांकि आपने बहुत बेहतर लिखा है  बंधुवर, किन्तु मैं कुछ हद तक सहमत होने के बावजूद, बहुत हद तक असहमत हूं आदरणीय ! दरअसल, अब से 50-55 साल पहले (कॉलेज की अध्यापकी, प्रशासनिक सेवा आदि जैसे प्रतिष्ठापित पदों को छोड़कर) जब मैंने अपने पिता जी से 'पत्रकार' बनने की ज़िद की थी, तब बहुत गाली खाई थीं 'कि यह खुद तो भूखा मरेगा ही, अपनी औलाद को भी भूखा मारेगा !' शायद वे सही थे, (बल्कि आज लगता है कि वे यकीनन सही थे) क्योंकि उस वक्त 'पत्रकारिता एक जुनून था, एक मिशन था ।'.... और शायद वे पत्रकारिता में मेरा भविष्य सुरक्षित नहीं देख रहे थे।


उस समय मेरे पास 'कथित मास कॉम या जर्नलिज्म' की कोई डिग्री या सर्टिफिकेट नहीं था। ऐसे संस्थान ही नहीं थे, जो हमें चुनौतीपूर्ण पत्रकारिता सिखाते! मैं DU से एम. ए. करने के बाद, जामिया मिल्लिया से पीएच. डी. कर रहा था...और दिल्ली की सड़कों पर, रात की शिफ्ट में ऑटो चला रहा था। वहीं से, शहर के दोनों चेहरे समझ में आने लगे थे--- एक 'दिन वाली दिल्ली....और दूसरी, रात वाली दिल्ली !' हर शहर के दो चेहरे होते हैं---एक दिन में, दूसरा रात में! दिल्ली के ये दोनों चेहरे देखने हों, तो मेरा उपन्यास पढ़िए---- 'नंगे शहर का सफ़रनामा! ' इसी दौर ने, बाद में मेरी पत्रकारिता को नये आयाम दिये। समाज की 'अंधेरी गलियों से मेरा परिचय कराया!' 


हालांकि बाद में, मैं 'एशिया के सबसे बड़े व प्रतिष्ठित समाचारपत्र संस्थान' तक पहुंच गया था--- जहां, 'बहुत ईमानदारी से पत्रकारिता करते हुए भी... मैं अपने बच्चों को दूध पिलाकर, अपनी कमाई से कभी-कभार दारू भी पी सकता था और इसके लिए मुझे अपना ज़मीर बेचने की ज़रूरत नहीं थी।' इससे अधिक की आवश्यकता भी उस समय नहीं थी।

 

यह भी एक अच्छा संयोग था कि मुझे अपने संवाददाताओं की जो टीम मिली, वह भी संभ्रांत और समृद्ध टीम थी। लिहाज़ा, उनमें भी 'बिकाऊ' लोगों का औसत बहुत कम था। शायद इसका कारण उस दौर की पत्रकारिता में शुचिता का बने रहना था। लेकिन कहते हैं न, कि सब कुछ ऊपर से ही नीचे की तरफ आता है ! .... गंगा जल हो या भ्रष्टाचार! हर तरफ, हर विभाग, हर क्षेत्र... यहां तक कि हमारी विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तक ! ... फिर भला इस सड़े-गले कथित 'चौथे खंभे' की क्या औक़ात ! 


केवल प्रधान संपादकों को पीटने से कुछ नहीं होगा भाई जी, वे तो बेचारे 'नौकर हैं' (संपादक नहीं) । वे 'मीडिया माफिया' का एक छोटा-सा तंत्र हैं--- जैसे बड़े-बड़े गैंगस्टर, अपने-अपने हित साधने के लिए 'गुर्गे' पालते हैं। इनमें बिल्डर हैं, लाइज़निंग करने वाले दलाल हैं, छद्म राजनीतिज्ञ, (घोषित-अघोषित) अपराधी हैं, भूपति हैं, उद्योगपति हैं.... और वे तमाम सारे लोग हैं, जो मीडिया की छवि के दम पर 'अनेक प्रकार की सत्ता या पॉवर' हासिल करना चाहते हैं ! 


एक और निराशाजनक सत्य है, जिसने पत्रकारिता को अधोपतन तक पहुंचा दिया।... 'एक समय सरकार ने भी (छद्म) संवेदनशीलता दिखाई और सोचा कि पत्रकार (ईमानदार) अपने बुढ़ापे में यकीनन भूखों मरते हैं, सो कांग्रेस सरकार ने यह दयादृष्टि दिखाई कि उसने हमारे PF का 'कॉन्ट्रीब्यूशन' वाला पैसा (एम्पलॉयर के योगदान का) खुद लेना शुरू कर दिया कि हम 'बुढ़ापे में (60 वर्ष की आयु के पश्चात) इन्हें, इस पैसे पर पेंशन देंगे।'


पत्रकारिता के पतन की प्रक्रिया को देखते हुए, बहुत दुखी मन से, मैंने अपनी 'नौकरी' रिटायरमेंट से सात-आठ साल पहले ही छोड़ दी। यानी, अभी सठियाया नहीं था....लिहाज़ा पेंशन भी अभी नहीं मिलनी थी।


अब, जब साठ वर्ष की आयु के बाद मैंने पेंशन मांगी, तो सरकार ने EPFO (एम्प्लाइज़ प्रॉविडेंट फंड ऑर्गेंनाइजेशन) योजना के तहत जो मेरा पैसा लिया था...उसी पर रुपए मात्र 1460/= प्रति माह देना शुरू कर दिया। हमने (मेरे जैसे अन्य जुझारू पत्रकारों ने) सरकार से कहा कि आप हमारा 'मूलधन' वापस कर दीजिए, हमें यह घृणात्मक पेंशन नहीं चाहिए। सरकार ने ऐसा करने से भी मना कर दिया ।.... और यह राशि कभी बढ़ेगी नहीं, बल्कि मेरी मृत्यु के बाद घटेगी। यह केवल मेरी निजि कहानी नहीं है, मेरे दौर के हर ईमानदार पत्रकार की कहानी भी है।


कहा गया कि आपके मरने के बाद, आपके परिवार की सुरक्षा भी तो देखनी है। लिहाजा किसी अविवाहित संतान के साथ, आपकी पत्नी को इस पेंशन का 75% प्रतिशत मिलेगा और अविवाहित संतान न हुई, तो पत्नी (या पति) को 50% ....1460/= में से --- आजीवन। इसमें कभी भी, किसी भी प्रकार की वृद्धि संभव नहीं है!

 

और यदि हम दोनों भी नहीं रहते हैं, तो वह पैसा 'अन क्लेम्ड' अकाउंट में चला जाएगा। दूसरी तरफ यदि कोई विधायक, शपथ लेने के बाद, जेल भी चला जाता है, तब भी वह आजीवन एक बड़ी पेंशन का हकदार होगा। दो बार विधायक बनने पर दो पेंशन और इसके बाद  जितनी बार भी सांसद बने, तो उतनी पेंशन अतिरिक्त---- इन पेंशन-भत्तों में (महंगाई को देखते हुए) इजाफा भी होता रहेगा। 


अब बताएं कि है कोई माई का लाल, जो इन हालात में भी ईमानदारी से पत्रकारिता करना चाहेगा? मेरे समय में ही यह कवायद शुरू हो गई थी कि ख़बर छपने के पैसे और ख़बर न छपने के भी पैसे! मजे की बात यह कि 'ख़बर न छपने के पैसे, ख़बर छपने के पैसों से ज्यादा हुआ करते थे !' मैं नहीं जानता कि आज, ख़बरों की ख़रीद-फ़रोख्त का बाज़ार भाव क्या है ! यह मैं 25-30 साल पहले की बात बता रहा हूं ! आप सोच सकते हैं कि आज 'ख़बरों का मूल्य' क्या होगा? 


आज मैं 72 वर्ष का होने जा रहा हूं...मुझे लगता है कि शायद मैं या मेरे जैसे लोग, जिनके साथ, वह आखिरी पीढ़ी समाप्त हो जाएगी, जिसने 'पत्रकारिता को करियर नहीं---मिशन या जुनून के रूप में चुना था ! तमाम विरोधाभासों के बावजूद। फिर भी, मैं निराशावादी नहीं हूं। 


हालांकि हर पिछली पीढ़ी को लगता है कि 'हम ही सही हैं या हम इनसे योग्य थे ! ये हमारे मूल्यों के अनुकूल नहीं हैं।' किन्तु मुझे लगता है कि यह एक संक्रमण काल है और हर पीढ़ी का एक संक्रमणकाल होता है और हर पीढ़ी, अपने समय की चुनौतियों के अनुसार अपने मूल्य या मापदंड निर्धारित करती है। इसलिए यह कहना कि आज की पीढ़ी में 'वह बात' नहीं है, मैं इससे सहमत नहीं हूं।


यह तो और भी आश्चर्यजनक तथ्य है कि हमारे समय में, पीढ़ियां 10-12 वर्षों के अंतराल में बदला करती थीं। अब तो, पांच साल के अंतराल में पीढ़ियों के बीच टकराव बढ़ रहा है, क्योंकि तकनीक साल-दर-साल बदल रही है। इसलिए 'पांच-छह साल का बड़ा बच्चा भी, छोटे भाई-बहन (विशेषकर भाई) को 'पुराना या बुर्जुआ' नज़र आने लगता है। 


ज़ाहिर है कि आज हम जैसे लोग, अपनी तीसरी या चौथी पीढ़ी पर निर्भर हैं 'कि बेटा, यह बिल कैसे भरूं, फोन हैंग हो गया है, कैसे ठीक करूं? ईत्यादि-इत्यादि' इसीलिए कह रहा हूं कि आप समय की प्रतीक्षा करें।


आप धैर्य रखें और यकीन भी कि शीघ्र ही एक ऐसी पीढ़ी आपके सामने आ खड़ी होगी जो अपनी तकनीकि क्षमता से, पत्रकारिता के भी नये प्रतिमान गढ़ देगी! शायद  AI का इसमें विशेष योगदान रहे! अभी भी, सोशल मीडिया ने खुद 'मीडिया' तथा तमाम प्रशासनिक अमले की नाक में दम कर रखा है ! भ्रष्ट लोग और तमाम तरह के माफिया पर सोशल मीडिया भी हावी है और सीसीटीवी तकनीक भी! भविष्य में यह तस्वीर और अधिक असरदार होने वाली है। भविष्य की संभावनाओं को मेरा नमन!

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