सोशल मीडिया से पैसे कमाने की 'मृगतृष्णा'
हर पोस्ट एक नए दांव की तरह लगती है, शायद यह वायरल हो जाए, शायद इससे पैसा बन जाए। |
सोशल मीडिया से पैसे कमाने का सपना इस देश में आज करोड़ों लोगों के लिए एक नया जुआ बन चुका है। ज्यादातर की शुरुआत अक्सर बहुत मासूम तरीके से होती है, कोई व्यक्ति बस अपने विचार लिखना चाहता है, कोई हँसी मजाक के वीडियो बनाता है, कोई अपनी आर्ट दिखाना चाहता है। लेकिन जैसे ही पहली बार किसी पोस्ट पर अचानक ज़्यादा लाइक्स, व्यूज़ या पैसे आते हैं, दिमाग में एक बहुत शक्तिशाली मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इसे “रिवॉर्ड लूप” कहा जाता है, जो दिमाग को बार-बार वही काम करने पर उकसाती है जिससे उसे तुरंत रिवॉर्ड मिला हो।
धीरे-धीरे व्यक्ति कंटेंट बनाने की बजाय रिज़ल्ट के पीछे भागने लगता है। वह अपने विचार नहीं लिख रहा होता, बल्कि एनालिटिक्स देख रहा होता है, कि किस पोस्ट पर कितनी रीच आई, किस मुद्दे पर ज़्यादा कमेंट आए, कहाँ लोग ज़्यादा झगड़े। ऐसा दिमाग फिर हर दिन इस पहेली को हल करने में लग जाता है कि एल्गोरिदम को कैसे खुश किया जाए। यह वही क्षण होता है जब क्रिएटिविटी की जगह एक तरह का डिजिटल जुआ शुरू हो जाता है। हर पोस्ट एक नए दांव की तरह लगती है, शायद यह वायरल हो जाए, शायद इससे पैसा बन जाए।
समस्या यह है कि इस खेल में जीतने वाले बहुत कम होते हैं। करोड़ों लोग रोज़ कंटेंट बना रहे होते हैं, लेकिन सच यह है कि उनमें से बहुत छोटा हिस्सा ही इससे स्थायी कमाई कर पाता है। फिर भी बाकी लोग लगे रहते हैं, क्योंकि बीच-बीच में मिलने वाला छोटा-सा वायरल मोमेंट उन्हें उम्मीद देता रहता है कि अगली बार बड़ा मौका मिल सकता है। यही अनिश्चित इनाम इंसान को सबसे ज़्यादा बाँधता है, बिल्कुल उसी तरह जैसे जुए की लत।
जब पैसे और रीच का दबाव बढ़ता है, तब कंटेंट की दिशा भी बदलने लगती है। लोग वही लिखने या बनाने लगते हैं जिससे बहस हो, गुस्सा पैदा हो, या सनसनी फैले।
करंट टॉपिक पर ज़्यादा से ज़्यादा लिख बोल देना चाहते हैं कि कहीं ये उस टॉपिक पर लाइक कॉमेंट्स बटोरने में पीछे ना रह जाएँ।
ये हरकत उस व्यक्ति को उसके असली विचारों से दूर पब्लिक की पसंद ना पसंद पर जा कर टिक जाती है। वे फिर वही बोलते हैं जो एल्गोरिदम को पसंद है, न कि जो वे सच में मानते हैं। इस प्रक्रिया में व्यक्ति की नैतिकता, सोच और पहचान तक प्रभावित होने लगती है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि बाहर से यह सब बहुत ग्लैमरस दिखता है, फॉलोअर्स, लाइक्स, वायरल पोस्ट। लेकिन अंदर से यह लगातार चिंता, तुलना और असुरक्षा से भरा खेल होता है। हर दिन यह डर रहता है कि कहीं रीच गिर न जाए, लोग भूल न जाएँ, कमाई बंद न हो जाए। इसलिए बहुत से लोग बिना रुके पोस्ट करते रहते हैं, भले ही उनके पास कहने को कुछ जरूरी न हो। लेकिन ये सोशल मीडिया प्लेटफार्म दो चार सेंट कमाने के लिए पुश करते रहते हैं, और यही लूप चलता रहता है।