Wednesday, September 30, 2020

आज तक की एंकर श्वेता सिंह का ट्वीट इस बात का सबूत है कि मीडिया में किस मानसिकता के लोग महत्वपूर्ण पदों पर हैं!

रवींद्र चौधरी

इस पोस्ट में जो स्क्रीनशॉट लगा हुआ है, उसे देखकर आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि हमारे मीडिया की ऐसी हालात क्यूँ है! यह ट्वीट है आजतक की जानी-मानी एंकर श्वेता सिंह का, जो 2000 के नोट में चिप के अविष्कार के लिए विख्यात रही हैं.


श्वेताजी की शिकायत है कि बॉलीवुड ने दशकों तक ‘सूदखोर बनिया’, ‘दुराचारी ठाकुर’ और ‘पाखंडी ब्राह्मण’ जैसे ‘नैरेटिव’ गढ़े (जो शायद गढ़े हुए भी नहीं हैं!). अब इसे श्वेताजी की अज्ञानता और जातिवादी मानसिकता ही कहा जाएगा कि उन्हें ठाकुरों, ब्राह्मणों और बनियों के साथ हो रही यह नाइंसाफ़ी तो दिख गई लेकिन यह नहीं दिखा कि बॉलीवुड की अधिकाँश फ़िल्मों में हीरो भी तो इन्हीं समुदायों के रहे हैं. कभी छोटे ठाकुर, कभी खन्ना साब, कभी चोपड़ा, कभी मेहरा, कभी तिवारी, कभी शर्मा तो कभी बैनर्जी तो कभी मुखर्जी! मतलब विलेन ठाकुर तो हीरो भी ठाकुर!


हाँ, पैरलल सिनेमा की फ़िल्में ज़रूर अपवाद कही जा सकती हैं, वो भी इसलिए क्योंकि वे दलित-उत्पीड़न जैसे मुद्दों पर बेस्ड होती थीं, इसलिए उनमें तो दलित रहेगा ही! अपवाद के तौर पर ‘चाची 420’ जैसी कोई एकाध फ़िल्म ही याद आती है, जिसमें हीरो का सरनेम ‘पासवान’ है. या हालिया ‘मसान’, जिसका हीरो 'डोम' है, हालांकि मसान को भी क्रॉसओवर सिनेमा कहना ही बेहतर होगा.


इसके अलावा, हमें बॉलीवुड में कभी भी कोई दलित या पिछड़ा हीरो नज़र नहीं आता. हमें नहीं याद पड़ता कि किसी फ़िल्म में हीरो का सरनेम ‘यादव’, ‘मीणा’ या ‘महतो’ जैसा रहा हो. लेकिन श्वेता जैसे लोगों को यह नैरेटिव नज़र नहीं आएगा क्योंकि ये लोग जातिवादी सड़ाँध में सर से पाँव तक डूबे हुए हैं और मीडिया पर इन्हीं लोगों का क़ब्ज़ा है. इंग्लिश मीडिया की हालत हिन्दी के मुक़ाबले फिर भी बेहतर है क्योंकि वहाँ सिर्फ़ हिन्दी पट्टी का ही प्रतिनिधित्व नहीं है. हिन्दी मीडिया में तो 90% से भी ज़्यादा सवर्ण जातियों के ही लोग भरे हुए हैं.


कुछ अरसा पहले मैंने परिचितों के बीच ऐसे ही पूछ लिया था कि ‘हिन्दी के न्यूज़ चैनलों में कोई दलित एंकर है क्या?’ तो मीडिया के ही कुछ दोस्त बुरा मान गए थे. उन्हें इस सवाल में जातिवाद नज़र आ गया था. लेकिन कमाल की बात ये है कि उन्हें इस तथ्य में कोई जातिवाद नज़र नहीं आया कि न्यूज़ चैनलों में कोई दलित एंकर है ही नहीं!

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